शिखर पर भगवा : एक नए युग की उद्घोषणा
इतिहास की ध्वनि और भविष्य की दृष्टि—एक ही क्षण में साकार

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के शिखर पर जब पावन भगवा पताका लहराई, तो यह केवल एक ध्वज का आरोहण नहीं था—यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास, ऐतिहासिक पुनरुत्थान और राष्ट्रचेतना के जागरण का प्रतीक था। पाँच सौ वर्षों के धैर्य, विश्वास और संघर्ष का यह क्षण भारत की आत्मा में एक अमिट लकीर की तरह दर्ज हो गया। उस पल ऐसा प्रतीत हुआ मानो त्रेता युग की आस्था आधुनिक भारत के हृदय में पुनः जीवंत होकर धड़क उठी हो।

लेकिन इतिहास का यह अध्याय यहीं समाप्त नहीं हुआ। अयोध्या में रामलला की छत्रछाया में उठी इस आध्यात्मिक तरंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में ‘पाञ्चजन्य’ स्मारक के लोकार्पण से और भी गहन प्रतिध्वनि प्रदान की। यह वही कुरुक्षेत्र है जहाँ द्वापर युग में धर्म और अधर्म के मध्य अंतिम निर्णायक संवाद हुआ; जहाँ श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्तव्य, साहस और धर्म का शाश्वत मार्ग दिखाया।
यह संयोग नहीं; यह सांस्कृतिक यात्रा के दो युगों का संगम था।
अयोध्या का शिखर और कुरुक्षेत्र का रण—दोनों मिलकर भारतीय सभ्यता के विराट चरित्र को सामने लाते हैं। एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श, दूसरी ओर योगेश्वर श्रीकृष्ण का दिव्य उपदेश। और दोनों को जोड़ते हुए एक ही संदेश—धर्म की स्थापना, राष्ट्र की सुरक्षा और सत्य के प्रति अटूट निष्ठा।
जन्मभूमि मंदिर पर लहराता केसरिया और कुरुक्षेत्र में गूंजता पाञ्चजन्य इस बात की घोषणा कर रहे थे कि भारत अब अपने मूल, अपनी जड़ों और अपनी गौरवगाथा को नए आत्मविश्वास के साथ स्वीकार कर रहा है। यह वह क्षण था जब लगा कि बीते युगों की पुकार वर्तमान भारत के कानों में फिर से गूँज उठी है।
अयोध्या का ध्वज कहता है—
“आस्था का अपमान सहकर भी जिसने धैर्य नहीं छोड़ा, वह अंततः विजय का अधिकारी होता है।”
कुरुक्षेत्र का पाञ्चजन्य पुकारता है—
“जब धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प अडिग हो, तो समूचा ब्रह्माण्ड भी पथ प्रशस्त कर देता है।”
इन दोनों घटनाओं के बीच एक सूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली ध्वनि सुनाई देती है—
भारत जाग रहा है। भारत लौट रहा है। भारत उठ रहा है।
यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं था; यह राष्ट्रीय चेतना की पुनर्स्थापना थी। बच्चों की आँखों में इतिहास का गर्व चमक रहा था, युवाओं के मन में नए भविष्य का संकल्प जन्म ले रहा था, और बुज़ुर्गों की आँखों में वह संतोष था कि सदियों की तपस्या अब पूर्णता की ओर अग्रसर है।
ऐसा लगा मानो अयोध्या की हवाओं में उड़ती भगवा पताका और कुरुक्षेत्र के आकाश में गुंजायमान पाञ्चजन्य—दोनों मिलकर यह कह रहे हों:
“यह नया भारत है—जहाँ आस्था और राष्ट्रभावना साथ-साथ चलती हैं, जहाँ इतिहास बोझ नहीं, प्रेरणा है, और जहाँ भविष्य स्वाभिमान की नींव पर खड़ा हो रहा है।”
इसलिए यह क्षण केवल स्मरण योग्य नहीं, बल्कि संजोने योग्य है—
क्योंकि इस दिन भारत ने अपने भीतर जलती उस लौ को फिर पहचाना,
जो न कभी बुझी थी, न कभी बुझेगी।
शिखर पर भगवा…
और हृदय में अखंड भारत का उजाला।


